Thursday, 21 September 2017

तुम ही हो।



मेरी ज़िंदगी एक उलझन है,
इसकी सुलझन तुम ही हो।
ये शब्द मेरे हैं लेकिन,
इनकी समझ तुम ही हो।
सभी इन पंक्तियों की चमक तुम ही हो।
बेवक्त जो लिखने बैठता हूँ कभी,
वो मेरी डायरी तुम ही हो।
कभी तुकभरी तो कभी बेतुकी,
ये मेरी शायरी तुम ही हो।
मसरूफ़ लमहों की सादगी,
ख़ाली वक़्त की आवारगी तुम ही हो।

मैं उड़ता हूँ कल्पनाओं में कहीं लेकिन,
मुझको ये उड़ाती हवा तुम ही हो।
मैं ठीक हूँ फ़िलहाल दुआ से,
पर मेरी दवा तुम ही हो।
बैठा होता हूँ मायूसी में फिर भी,
अंदर है जो आस वो तुम ही हो।
दूर यूँ तो हो गया हूँ ख़ुद से भी मैं,
कोई है जो पास वो तुम ही हो।
हूँ मामूली मैं एक इंसान मतलबी,
मुझमें जो है ख़ास वो तुम ही हो।
ये आँखों की ख़ामोश सी गहराई मेरी,
इनमें छुपा जो राज़ वो तुम ही हो।
और बीच कहीं दोनों कल की तलाश के,
जो है मेरा आज वो तुम ही हो।
हज़ार कोशिशों के बाद,
मेरे इश्क़ की इजाद तुम ही हो।
मेरी शकसियत की बुनियाद,
मेरी हर साँस की फ़रियाद तुम ही हो।

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By Vish

Organized Sinners